श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 61: अर्जुनका उत्तरकुमारको आश्वासन तथा अर्जुनसे दु:शासन आदिकी पराजय  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  4.61.12 
अवसीदन्ति मे प्राणा भूरियं चलतीव च।
न च प्रतोदं रश्मींश्च संयन्तुं शक्तिरस्ति मे॥ १२॥
 
 
अनुवाद
इस समय मेरी आत्मा व्याकुल है। यह पृथ्वी काँपती हुई प्रतीत हो रही है। इस समय मुझमें इतनी शक्ति नहीं है कि मैं घोड़ों को वश में कर सकूँ और चाबुक से उन्हें हाँक सकूँ।॥12॥
 
‘At this moment my soul is restless. This earth seems to be trembling. At this moment I do not have enough strength to control the horses and drive them with the whip.’॥ 12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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