श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 61: अर्जुनका उत्तरकुमारको आश्वासन तथा अर्जुनसे दु:शासन आदिकी पराजय  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  4.61.11 
नाददानं न संधानं न मुञ्चन्तं शरोत्तमान्।
त्वामहं सम्प्रपश्यामि पश्यन्नपि न चेतन:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
मैं यह नहीं देख पाता कि आप कब उत्तम बाणों को हाथ में लेते हैं, कब उन्हें धनुष पर चढ़ाते हैं और कब छोड़ते हैं; और देखकर भी मैं सचेत नहीं रह पाता हूँ॥ 11॥
 
I am unable to see when you take the excellent arrows in your hands, when you place them on the bow and when you release them; and even after watching I am unable to remain conscious.॥ 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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