श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 6: युधिष्ठिरद्वारा दुर्गादेवीकी स्तुति और देवीका प्रत्यक्ष प्रकट होकर उन्हें वर देना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  4.6.1 
वैशम्पायन उवाच
विराटनगरं रम्यं गच्छमानो युधिष्ठिर:।
अस्तुवन्मनसा देवीं दुर्गां त्रिभुवनेश्वरीम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन! विराट् सुन्दर नगर में प्रवेश करते समय राजा युधिष्ठिर ने मन ही मन त्रिभुवन की अधिष्ठात्री दुर्गादेवी की इस प्रकार स्तुति की - 1॥
 
Vaishampayanji says- Rajan! While entering the beautiful city of Virat, King Yudhishthir in his mind praised Durgadevi, the presiding deity of Tribhuvan, in this way - 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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