Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 4.58.66-67: उनके बाणों में वायु भी प्रवेश नहीं कर पाती थी। कुंतीपुत्र अर्जुन निरन्तर बाणों को हाथ में लेकर, उन्हें धनुष पर चढ़ाकर छोड़ते रहते थे। उनके कार्यों में किसी को भी क्षण भर का भी अन्तर दिखाई नहीं देता था। 66-67 | mahabharat अध्याय 4.58: अर्जुनका द्रोणाचार्यके साथ युद्ध और आचार्यका पलायन । mahabharat पर्व 4: विराट पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
न च बाणान्तरे वायुरस्य शक्नोति सर्पितुम्।
अनिशं संदधानस्य शरानुत्सृजतस्तथा॥ ६६॥
ददर्श नान्तरं कश्चित् पार्थस्याददतोऽपि च॥ ६७॥
अनुवाद
उनके बाणों में वायु भी प्रवेश नहीं कर पाती थी। कुंतीपुत्र अर्जुन निरन्तर बाणों को हाथ में लेकर, उन्हें धनुष पर चढ़ाकर छोड़ते रहते थे। उनके कार्यों में किसी को भी क्षण भर का भी अन्तर दिखाई नहीं देता था। 66-67
Even air could not enter his arrows. Kunti's son Arjuna was continuously taking the arrows in his hand, placing them on the bow and releasing them. No one could see even a moment's difference in his actions. 66-67.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥