श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 58: अर्जुनका द्रोणाचार्यके साथ युद्ध और आचार्यका पलायन  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  4.58.55 
ततो नागा रथाश्चैव वाजिनश्च विशाम्पते।
शोणिताक्ता व्यदृश्यन्त पुष्पिता इव किंशुका:॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
हे जनमेजय! उस समय हाथी, रथ और घुड़सवार रक्त से भीगे हुए पुष्पित पलाश वृक्षों के समान दिखाई दे रहे थे॥55॥
 
O Janamejaya! At that time the elephant riders, charioteers and horse riders looked like the blooming Palaash trees, soaked in blood. ॥ 55॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)