श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 58: अर्जुनका द्रोणाचार्यके साथ युद्ध और आचार्यका पलायन  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  4.58.52 
ऐन्द्रं वायव्यमाग्नेयमस्त्रमस्त्रेण पाण्डव:।
द्रोणेन मुक्तमात्रं तु ग्रसति स्म पुन: पुन:॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
पाण्डु नन्दन अर्जुन आचार्य द्रोण के छोड़े हुए ऐन्द्र, वायव्य और आग्नेय आदि अस्त्रों को अपने प्रतिद्वन्द्वियों के अस्त्रों से बार-बार नष्ट कर देते थे ॥52॥
 
Pandanu Nandan Arjun used to repeatedly destroy the weapons left by Acharya Drona like Aindra, Vayavya and Agneya etc. with his opponent's weapons. 52॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)