श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 58: अर्जुनका द्रोणाचार्यके साथ युद्ध और आचार्यका पलायन  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  4.58.42 
एवं तौ स्वर्णविकृतान् विमुञ्चन्तौ महाशरान्।
आकाशं संवृतं वीरावुल्काभिरिव चक्रतु:॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार दोनों वीरों ने सुवर्ण से विभूषित अपने महाबली बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी और आकाश को उल्काओं से आच्छादित कर दिया ॥ 42॥
 
Thus, both the heroes began to shower their mighty arrows decorated with gold, and thus covered the sky with meteors. ॥ 42॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)