श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 58: अर्जुनका द्रोणाचार्यके साथ युद्ध और आचार्यका पलायन  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  4.58.26 
द्रोणं हि समरे कोऽन्यो योद्‍धुमर्हति फाल्गुनात्।
रौद्र: क्षत्रियधर्मोऽयं गुरुणा यदयुध्यत।
इत्यब्रुवञ्जनास्तत्र संग्रामशिरसि स्थिता:॥ २६॥
 
 
अनुवाद
अर्जुन के अतिरिक्त और कौन युद्ध में द्रोणाचार्य का सामना कर सकता है? यह क्षत्रिय धर्म कैसा भयंकर है कि शिष्य को अपने गुरु से ही युद्ध करना पड़ता है।’ इस प्रकार युद्ध के मुहाने पर खड़े हुए योद्धा आपस में बातें कर रहे थे॥ 26॥
 
Who other than Arjuna can face Dronacharya in battle? How terrible is this Kshatriya Dharma that a disciple has to fight with his Guru.' Thus the warriors standing there at the mouth of the battle were talking amongst themselves.॥ 26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)