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mahabharat 4.58.16-17: तत्पश्चात् शत्रु योद्धाओं का नाश करने वाले महारथी महाबाहु एवं पराक्रमी कुन्तीपुत्र अर्जुन हर्ष में भर गये, उन्होंने अपना रथ आचार्य द्रोण के रथ से भिड़ा दिया, उन्हें प्रणाम किया और हँसते हुए शान्त, मधुर वाणी में बोले- 16-17॥   |   mahabharat अध्याय 4.58: अर्जुनका द्रोणाचार्यके साथ युद्ध और आचार्यका पलायन   ।   mahabharat पर्व 4: विराट पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 58: अर्जुनका द्रोणाचार्यके साथ युद्ध और आचार्यका पलायन  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  4.58.16-17 
हर्षयुक्तस्तत: पार्थ: प्रहसन्निव वीर्यवान्।
रथं रथेन द्रोणस्य समासाद्य महारथ:॥ १६॥
अभिवाद्य महाबाहु: सामपूर्वमिदं वच:।
उवाच श्लक्ष्णया वाचा कौन्तेय: परवीरहा॥ १७॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् शत्रु योद्धाओं का नाश करने वाले महारथी महाबाहु एवं पराक्रमी कुन्तीपुत्र अर्जुन हर्ष में भर गये, उन्होंने अपना रथ आचार्य द्रोण के रथ से भिड़ा दिया, उन्हें प्रणाम किया और हँसते हुए शान्त, मधुर वाणी में बोले- 16-17॥
 
Thereafter, Arjun, the great-armed and mighty son of Kunti, the great charioteer who destroyed the enemy warriors, became filled with joy, clashed his chariot with the chariot of Acharya Drona, paid obeisance to him, and spoke in a calm, sweet voice while laughing - 16-17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)