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श्लोक  4.57.14 
स तु शब्देन लोकांस्त्रीनावृत्य रथिनां वर:।
धनुरादाय सुमहज्ज्याशब्दमकरोत् तदा॥ १४॥
 
 
अनुवाद
अपने शंख की ध्वनि से तीनों लोकों को गुंजायमान करके, महारथियों में श्रेष्ठ कृपाचार्य ने धनुष हाथ में लिया और उसकी डोरी खींचकर घुमड़ने वाली ध्वनि उत्पन्न की।
 
Having made the three worlds resound with the sound of his conch, that best of charioteers, Krupacharya took the bow in his hand and pulled its string and produced a twirling sound.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)