श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 55: अर्जुनद्वारा कौरवसेनाका संहार और उत्तरका उनके रथको कृपाचार्यके पास ले जाना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  4.55.6 
दिव्ययोगाच्च पार्थस्य हयानामुत्तरस्य च।
शिक्षाशिल्पोपपन्नत्वादस्त्राणां च परिक्रमात्।
वीर्यवत्त्वं द्रुतं चाग्रॺं दृष्ट्वा जिष्णोरपूजयन्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
अर्जुन का दिव्यास्त्रों का प्रयोग, घोड़ों का प्रशिक्षण, उत्तरा का रथ चलाने का कौशल और पार्थ का अस्त्र-शस्त्र चलाने का ढंग, साथ ही उनका पराक्रम और महान चपलता देखकर शत्रु भी उनकी प्रशंसा करने लगे ॥6॥
 
Seeing Arjuna's use of divine weapons, the training of horses, Uttara's skill in driving chariots and Partha's method of using weapons, as well as their valour and great agility, even their enemies began to praise them. ॥ 6॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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