श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 55: अर्जुनद्वारा कौरवसेनाका संहार और उत्तरका उनके रथको कृपाचार्यके पास ले जाना  »  श्लोक 46-47
 
 
श्लोक  4.55.46-47 
अस्याविदूरे हि धनुर्ध्वजाग्रे यस्य दृश्यते।
आचार्यस्यैष पुत्रो वै अश्वत्थामा महारथ:॥ ४६॥
सदा ममैष मान्यस्तु सर्वशस्त्रभृतामपि।
एतस्य त्वं रथं प्राप्य निवर्तेथा: पुन: पुन:॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
उसके आगे, जिसकी ध्वजा के अग्रभाग पर धनुष का चिह्न दिखाई देता है, गुरुपुत्र महारथी अश्वत्थामा है। वह भी मेरे तथा समस्त शस्त्रधारियों द्वारा आदरणीय है, अतः उसके रथ के पास जाकर भी तुम्हें बार-बार लौटना चाहिए ॥46-47॥
 
Next to him, on the front of whose flag the mark of a bow is visible, is the worthy son of the teacher, the great warrior Ashwatthama. He too is respected by me and all the weapon bearers, so even after going near his chariot, you should return again and again. ॥ 46-47॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)