श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 55: अर्जुनद्वारा कौरवसेनाका संहार और उत्तरका उनके रथको कृपाचार्यके पास ले जाना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  4.55.17 
रथशक्तिममित्राणां प्रागेव निपतद् भुवि।
सोऽपयात् सहसा पश्चात् साहसाच्चाभ्युपेयिवान्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
अर्जुन ने शत्रुओं की रथसेना को पहले ही भूमि पर गिरा दिया था। फिर जो लोग समर्थ नहीं थे, उन्हें मारने का दुस्साहस करना अनुचित समझकर एक बार तो वहाँ से हट गया, किन्तु (युद्ध के लिए तत्पर सैनिकों को देखकर) पुनः उनके पास आ गया॥17॥
 
Arjuna had already laid down the chariot force of the enemy on the ground. Then, considering it an inappropriate act of daring to kill those who were not capable, he moved away from there once, but (seeing those soldiers ready for battle) he again came to them.॥ 17॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas