श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 54: अर्जुनका कर्णपर आक्रमण, विकर्णकी पराजय, शत्रुंतप और संग्रामजित् का वध, कर्ण और अर्जुनका युद्ध तथा कर्णका पलायन  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  4.54.34 
स हस्तिनेवाभिहतो गजेन्द्र:
प्रगृह्य भल्लान् निशितान् निषङ्गात्।
आकर्णपूर्णं च धनुर्विकृष्य
विव्याध गात्रेष्वथ सूतपुत्रम्॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
उस समय अर्जुन की स्थिति उस हाथीराज की सी थी जो अपने प्रतिद्वन्द्वी हाथी का प्रहार सहकर स्वयं उस पर आक्रमण करने को उद्यत हो। उसने अपने तरकश से भल्ल नामक तीक्ष्ण बाण निकाले और धनुष को कान तक खींचकर सारथिपुत्र के शरीर के अंगों को छेद डाला।
 
At that time Arjuna was in the same state as that of a king of elephants who, after bearing the blow of his rival elephant, is ready to attack him himself. He took out sharp arrows called Bhall from his quiver and drawing the bow till the ear, pierced the body parts of the son of a charioteer.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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