श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 54: अर्जुनका कर्णपर आक्रमण, विकर्णकी पराजय, शत्रुंतप और संग्रामजित् का वध, कर्ण और अर्जुनका युद्ध तथा कर्णका पलायन  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  4.54.33 
शरास्त्रवृष्टॺा निहतो महात्मा
प्रादुश्चकारातिमनुष्यकर्म।
प्राच्छादयत् कर्णरथं पृषत्कै-
र्लोकानिमान् सूर्य इवांशुजालै:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
कर्ण के बाणों की वर्षा से आहत महात्मा अर्जुन ने अलौकिक पराक्रम का परिचय दिया। जिस प्रकार सूर्य अपनी किरणों से सम्पूर्ण जगत को ढक लेता है, उसी प्रकार उन्होंने बाणों की वर्षा से कर्ण के रथ को ढक दिया।
 
Mahatma Arjuna, who was hurt by the shower of arrows from Karna, displayed superhuman valour. Just as the Sun covers the entire world with its rays, in the same way he covered Karna's chariot with a shower of arrows.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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