श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 54: अर्जुनका कर्णपर आक्रमण, विकर्णकी पराजय, शत्रुंतप और संग्रामजित् का वध, कर्ण और अर्जुनका युद्ध तथा कर्णका पलायन  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  4.54.18 
शोणाश्ववाहस्य हयान् निहत्य
वैकर्तनभ्रातुरदीनसत्त्व:।
एकेन संग्रामजित: शरेण
शिरो जहाराथ किरीटमाली॥ १८॥
 
 
अनुवाद
उनके हृदय में विनम्रता का लेशमात्र भी नहीं था। वे सुन्दर मुकुट और मालाओं से सुशोभित थे। लाल घोड़ों वाले रथ पर बैठकर उन्होंने सामने आए कर्ण के भाई संग्रामजित के घोड़ों को मार डाला और एक बाण से उसका सिर भी धड़ से अलग कर दिया।
 
There was not a trace of humility in his heart. He was adorned with a beautiful crown and garlands. Sitting on a chariot drawn by red horses, he killed the horses of Karna's brother Sangramjit who came in front of him and also severed his head from the body with an arrow.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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