श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 54: अर्जुनका कर्णपर आक्रमण, विकर्णकी पराजय, शत्रुंतप और संग्रामजित् का वध, कर्ण और अर्जुनका युद्ध तथा कर्णका पलायन  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  4.54.13 
तत: स विद्धो भरतर्षभेण
बाणेन गात्रावरणातिगेन।
गतासुराजौ निपपात भूमौ
नगो नगाग्रादिव वातरुग्ण:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
भरतश्रेष्ठ अर्जुन के बाण उसके कवच को भेदकर उसके शरीर में घुस गए। उनसे घायल होकर राजा शत्रुताप प्राण त्यागकर जैसे आँधी से उखड़कर वृक्ष पर्वत शिखर से गिर पड़ता है, उसी प्रकार वह युद्धभूमि में अपने रथ से गिर पड़ा॥13॥
 
The arrows of Arjuna, the best of the Bharatas, would pierce his armour and enter his body. Wounded by them, King Shatrutap lost his life and just like a tree uprooted by a storm falls from a mountain peak, in the same manner he fell from his chariot on the battlefield.॥13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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