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mahabharat 4.51.17: वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! इसके बाद कर्ण, भीष्म और महात्मा कृपाचार्य सहित दुर्योधन ने आचार्य द्रोण से क्षमा मांगी। 17॥   |   mahabharat अध्याय 4.51: भीष्मजीके द्वारा सेनामें शान्ति और एकता बनाये रखनेकी चेष्टा तथा द्रोणाचार्यके द्वारा दुर्योधनकी रक्षाके लिये प्रयत्न   ।   mahabharat पर्व 4: विराट पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 51: भीष्मजीके द्वारा सेनामें शान्ति और एकता बनाये रखनेकी चेष्टा तथा द्रोणाचार्यके द्वारा दुर्योधनकी रक्षाके लिये प्रयत्न  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  4.51.17 
वैशम्पायन उवाच
ततो दुर्योधनो द्रोणं क्षमयामास भारत।
सह कर्णेन भीष्मेण कृपेण च महात्मना॥ १७॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! इसके बाद कर्ण, भीष्म और महात्मा कृपाचार्य सहित दुर्योधन ने आचार्य द्रोण से क्षमा मांगी। 17॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Thereafter Duryodhana along with Karna, Bhishma and Mahatma Kripacharya sought forgiveness from Acharya Drona. 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)