श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 50: अश्वत्थामाके उद्‍गार  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  4.50.15 
क्षयाय धार्तराष्ट्राणां प्रादुर्भूतो धनंजय:।
त्वं पुन: पण्डितो भूत्वा वाचं वक्तुमिहेच्छसि॥ १५॥
 
 
अनुवाद
धनंजय तो धृतराष्ट्र के पुत्रों का वध करने के लिए ही प्रकट हुए हैं और तुम ही विद्वान बनने का ढोंग रच रहे हो और बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हो ॥16॥
 
Dhananjaya has appeared only to kill the sons of Dhritarashtra and you are the one who is trying to pretend to be a scholar and talk big. ॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)