श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 50: अश्वत्थामाके उद्‍गार  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  4.50.14 
यथाशक्ति मनुष्याणां शममालक्षयामहे।
अन्येषामपि सत्त्वानामपि कीटपिपीलिकै:।
द्रौपद्या: सम्परिक्लेशं न क्षन्तुं पाण्डवोऽर्हति॥ १४॥
 
 
अनुवाद
हम देखते हैं कि चाहे मनुष्य हो, चाहे अन्य कोई प्राणी हो, चाहे कीड़े-मकोड़े हों, सबकी अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार सहनशीलता की एक सीमा होती है। द्रौपदी को जो कष्ट पहुँचाया गया, उसे पाण्डुपुत्र अर्जुन कभी क्षमा नहीं कर सकता॥14॥
 
We see that whether it is a human being or any other living creature or even insects, all have a limit to their tolerance according to their respective strengths. The sufferings inflicted on Draupadi can never be forgiven by Pandu's son Arjun.॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)