श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 49: कृपाचार्यका कर्णको फटकारते हुए युद्धके विषयमें अपना विचार बताना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  4.49.1 
कृप उवाच
सदैव तव राधेय युद्धे क्रूरतरा मति:।
नार्थानां प्रकृतिं वेत्सि नानुबन्धमवेक्षसे॥ १॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् कृपाचार्य बोले - राधानन्दन! युद्ध के विषय में तुम्हारे विचार सदैव क्रूर होते हैं। तुम न तो अपने कर्मों के स्वरूप को जानते हो और न उनके फल के विषय में सोचते हो। 1॥
 
Thereafter Kripacharya said – Radhanandan! Your thoughts about war are always cruel. You neither know the nature of your actions nor think about their results. 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)