श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 47: दुर्योधनके द्वारा युद्धका निश्चय तथा कर्णकी उक्ति  »  श्लोक 26-27
 
 
श्लोक  4.47.26-27 
सदा च वायवो वान्ति नित्यं वर्षति वासव:।
स्तनयित्नोश्च निर्घोष: श्रूयते बहुशस्तथा॥ २६॥
किमत्र कार्यं पार्थस्य कथं वा स प्रशस्यते।
अन्यत्र कामाद् द्वेषाद् वा रोषादस्मासु केवलात्॥ २७॥
 
 
अनुवाद
वायु तो सदैव बहती रहती है। इन्द्र सदैव वर्षा करते हैं। बादलों का गर्जन प्रायः सुनाई देता है। (इसमें भय या अपशकुन मानने की क्या बात है?) इसमें अर्जुन का क्या कार्य है (यह चमत्कार क्या है?) इसके लिए उसकी प्रशंसा क्यों की जाती है? इसके अतिरिक्त और क्या कारण हो सकता है कि आचार्य अर्जुन का हित करने की इच्छा रखते हैं और उनके हृदय में हमारे प्रति केवल द्वेष और क्रोध का भाव है?॥ 26-27॥
 
‘The wind always blows. Indra always rains. The roar of the clouds is often heard. (What is there to fear or consider it a bad omen?) What is Arjun's role in this (what is the miracle?) Why is he praised for this? What other reason can there be for this except that the Acharya has a desire to do good to Arjun and he has only feelings of hatred and anger towards us in his heart?॥ 26-27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)