श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 47: दुर्योधनके द्वारा युद्धका निश्चय तथा कर्णकी उक्ति  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  4.47.25 
अश्वानां ह्रेषितं श्रुत्वा क: प्रशंसापरो भवेत्।
स्थाने वापि व्रजन्तो वा सदा ह्रेषन्ति वाजिन:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
घोड़ों की हिनहिनाहट सुनकर कौन किसी की प्रशंसा करता है? घोड़े तो सदैव हिनहिनाते ही हैं, चाहे वे अपने स्थान पर हों या यात्रा कर रहे हों (इसका किसी के पराक्रम से क्या सम्बन्ध है?)॥25॥
 
‘Who praises someone just on hearing the neighing of horses? Horses always neigh, whether they are at their place or travelling (what connection does this have with someone's bravery?)॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)