vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 4: विराट पर्व
»
अध्याय 47: दुर्योधनके द्वारा युद्धका निश्चय तथा कर्णकी उक्ति
»
श्लोक 21
श्लोक
4.47.21
जानाति हि मतं तेषामतस्त्रासयतीह न:।
अर्जुने चास्य सम्प्रीतिमधिकामुपलक्षये॥ २१॥
अनुवाद
वह पाण्डवों का मत जानता है, इसीलिए वह हमें यहाँ डरा रहा है और मैं देख रहा हूँ कि अर्जुन के प्रति उसका प्रेम अधिक है॥ 21॥
He knows the opinion of the Pandavas, that is why he is scaring us here and I see his love for Arjuna is more.॥ 21॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×