श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 45: अर्जुनद्वारा युद्धकी तैयारी, अस्त्र-शस्त्रोंका स्मरण, उनसे वार्तालाप तथा उत्तरके भयका निवारण  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  4.45.5 
वैशम्पायन उवाच
अर्जुनस्य वच: श्रुत्वा त्वरावानुत्तरस्तदा।
अर्जुनस्यायुधान् गृह्य शीघ्रेणावातरत् तत:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! अर्जुन की यह बात सुनकर उत्तरा अधीर हो गई और अर्जुन के समस्त अस्त्र-शस्त्र लेकर शीघ्रतापूर्वक वृक्ष से नीचे उतर आई।
 
Vaishmpayana says - Janamejaya! On hearing this statement of Arjuna, Uttara became impatient and quickly came down from the tree taking all the weapons of Arjuna. 5.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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