श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 45: अर्जुनद्वारा युद्धकी तैयारी, अस्त्र-शस्त्रोंका स्मरण, उनसे वार्तालाप तथा उत्तरके भयका निवारण  »  श्लोक 40-41
 
 
श्लोक  4.45.40-41 
उपजीव्य गुरुं द्रोणं शक्रं वैश्रवणं यमम्।
वरुणं पावकं चैव कृपं कृष्णं च माधवम्॥ ४०॥
पिनाकपाणिनं चैव कथमेतान् न योधये।
रथं वाहय मे शीघ्रं व्येतु ते मानसो ज्वर:॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
मुझे गुरुवर द्रोणाचार्य, इंद्र, कुबेर, यमराज, वरुण, अग्निदेव, कृपाचार्य, लक्ष्मीपति श्रीकृष्ण और पिनाकपाणि भगवान शंकर की शरण प्राप्त है। फिर मैं इन महारथियों से युद्ध क्यों नहीं कर पाऊँगा? मेरे रथ को शीघ्र हाँको; तुम्हारी मानसिक चिंताएँ दूर हो जाएँ।
 
I have received the shelter of Guruvar Dronacharya, Indra, Kuber, Yamraj, Varun, Agnidev, Kripacharya, Lakshmipati Shri Krishna and Pinakpani Lord Shankar. Then why won't I be able to fight with these great warriors? Drive my chariot quickly; Your mental worries should go away.
 
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि उत्तरगोग्रहे उत्तरार्जुनयोर्वाक्यं नाम पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय:॥ ४५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें उत्तरगोग्रहके अवसरपर विराटकुमार उत्तर और अर्जुनकी बातचीतविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४५॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ६ श्लोक मिलाकर कुल ४७ श्लोक हैं।)
 
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd