श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 45: अर्जुनद्वारा युद्धकी तैयारी, अस्त्र-शस्त्रोंका स्मरण, उनसे वार्तालाप तथा उत्तरके भयका निवारण  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  4.45.25 
वैशम्पायन उवाच
ततो विमुच्य बाहुभ्यां वलयानि स वीर्यवान्।
चित्रे काञ्चनसंनाहे प्रत्यमुञ्चत् तदा तले॥ २५॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - हे जनमेजय! तत्पश्चात् वीर अर्जुन ने अपने हाथों से कंगन और चूड़ियाँ उतार दीं और हथेलियों पर सोने के बने विचित्र कवच धारण कर लिए॥ 25॥
 
Vaishmpayana says: O Janamejaya! Thereafter the valiant Arjuna removed the bangles and bracelets from his hands and wore strange armour made of gold on his palms.॥ 25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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