श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 45: अर्जुनद्वारा युद्धकी तैयारी, अस्त्र-शस्त्रोंका स्मरण, उनसे वार्तालाप तथा उत्तरके भयका निवारण  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  4.45.13 
मन्ये त्वां क्लीबवेषेण चरन्तं शूलपाणिनम्।
गन्धर्वराजप्रतिमं देवं वापि शतक्रतुम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
नपुंसक कामनाओं में विचरण करने वाले आपको मैं शूलपाणि भगवान शंकर का स्वरूप अथवा गंधर्वराज अथवा साक्षात देवराज इन्द्र के समान मानता हूँ॥13॥
 
I consider you, the one who wanders in impotent desires, to be the form of Shulpani Lord Shankar or similar to the Gandharva king or the real Devraj Indra. 13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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