श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 45: अर्जुनद्वारा युद्धकी तैयारी, अस्त्र-शस्त्रोंका स्मरण, उनसे वार्तालाप तथा उत्तरके भयका निवारण  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  4.45.12 
एवं युक्ताङ्गरूपस्य लक्षणै: सूचितस्य च।
केन कर्मविपाकेन क्लीबत्वमिदमागतम्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
(वह चिंता इस प्रकार है-) आपका प्रत्येक अंग और रूप सब प्रकार से उपयुक्त है। आपके लक्षण भी आपको अलौकिक बताते हैं। ऐसी स्थिति में, किस कर्म के कारण आपको यह नपुंसकता प्राप्त हुई है?॥12॥
 
(That concern is as follows-) Your every part and form is suitable in every way. Your features also indicate you to be supernatural. In such a condition, due to which karma have you got this impotence?॥12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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