श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 45: अर्जुनद्वारा युद्धकी तैयारी, अस्त्र-शस्त्रोंका स्मरण, उनसे वार्तालाप तथा उत्तरके भयका निवारण  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  4.45.11 
इदं तु चिन्तयन्नेवं परिमुह्यामि केवलम्।
निश्चयं चापि दुर्मेधा न गच्छामि कथंचन॥ ११॥
 
 
अनुवाद
इस एक बात का विचार करते-करते मैं इतना मोहित हो जाता हूँ कि अपनी क्षीण बुद्धि के कारण किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाता हूँ ॥11॥
 
Just thinking about this one thing, I become so tempted that due to my poor intellect, I am unable to reach any conclusion. ॥11॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd