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श्लोक 4.44.24  |
दिष्टॺा त्वां पार्थ पश्यामि स्वागतं ते धनंजय।
लोहिताक्ष महाबाहो नागराजकरोपम॥ २४॥ |
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| अनुवाद |
| कुन्तीनन्दन! आपसे मिलकर मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ। धनंजय! आपका स्वागत है। महाबाहो! आपकी आँखें लाल हैं और आपकी भुजाएँ हाथीराज की सूंड को भी लज्जित कर रही हैं।॥ 24॥ |
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| Kuntinandan! I am fortunate to have met you. Dhananjay! You are welcome. Mahabaho! Your eyes are red and your arms are putting the proboscis of the elephant king to shame.॥ 24॥ |
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