श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 41: उत्तरका अर्जुनके आदेशके अनुसार शमीवृक्षसे पाण्डवोंके दिव्य धनुष आदि उतारना  »  श्लोक 6-8h
 
 
श्लोक  4.41.6-8h 
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त: स पार्थेन रथात् प्रस्कन्द्य कुण्डली।
आरुरोह शमीवृक्षं वैराटिरवशस्तदा॥ ६॥
तमन्वशासच्छत्रुघ्नो रथे तिष्ठन् धनंजय:।
अवरोपय वृक्षाग्राद् धनूंष्येतानि मा चिरम्॥ ७॥
परिवेष्टनमेतेषां क्षिप्रं चैव व्यपानुद।
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! अर्जुन की यह बात सुनकर कुण्डलधारी विराटपुत्र शमी वृक्ष पर चढ़ने को विवश हो गया। तब रथ पर बैठे हुए शत्रुनाशक पृथा के पुत्र धनंजय ने राजकवि की वाणी में कहा - 'शीघ्र ही इन धनुषों को वृक्ष से उतार लो और इन सबके पत्तेदार वस्त्र भी शीघ्र ही उतार दो।'
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! On hearing this from Arjun, Virata's son wearing the earrings was compelled to jump from the chariot and climb the Shami tree. Then Dhananjay, the son of enemy destroyer Pritha, sitting on the chariot, said in the voice of the ruler - 'Quickly take down these bows from the tree and quickly remove the leafy clothes of all of them'. 6-7 1/2"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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