श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 40: अर्जुनका उत्तरको शमीवृक्षसे अस्त्र उतारनेके लिये आदेश  »  श्लोक 5-6
 
 
श्लोक  4.40.5-6 
ध्वजा: शराश्च शूराणां दिव्यानि कवचानि च।
अत्र चैतन्महावीर्यं धनु: पार्थस्य गाण्डिवम्॥ ५॥
एकं शतसहस्रेण सम्मितं राष्ट्रवर्धनम्।
व्यायामसहमत्यर्थं तृणराजसमं महत्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
उन वीर योद्धाओं की ध्वजाएँ, बाण और दिव्य कवच भी यहाँ हैं। यहाँ अर्जुन का महाबली गाण्डीव धनुष है, जो अकेला ही एक लाख धनुषों के बराबर है। यह राष्ट्र की वृद्धि करने में समर्थ है, कष्टों को सहन करने में समर्थ है और ताड़ के वृक्ष के समान विशाल है।॥5-6॥
 
‘The flags, arrows and divine armour of those valiant warriors are also here. Here is Arjuna's mighty Gandiva bow, which alone is equivalent to a lakh bows. It is capable of enhancing the nation, is capable of bearing hardships and is as huge as a palm tree. ॥ 5-6॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas