वैशम्पायन उवाच
इति स्म कुरव: सर्वे विमृशन्त: पृथक् पृथक्।
न च व्यवसितुं किंचिदुत्तरं शक्नुवन्ति ते॥ ३९॥
छन्नं तथा तं सत्रेण पाण्डवं प्रेक्ष्य भारत।
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं - भरत! इस प्रकार सभी कौरव अलग-अलग विचार-विमर्श कर रहे थे, किन्तु वेश बदलकर छिपे हुए पाण्डव पुत्र अर्जुन और उत्तरा को देखकर भी किसी निर्णय पर नहीं पहुँच पा रहे थे।
Vaishmpayana says - Bharat! In this way all the Kauravas were discussing separately, but even after seeing the Pandava son Arjun and Uttara hidden in disguise, they were unable to reach any decision.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)