श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 36: उत्तरका अपने लिये सारथि ढूँढ़नेका प्रस्ताव, अर्जुनकी सम्मतिसे द्रौपदीका बृहन्नलाको सारथि बनानेके लिये सुझाव देना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  4.36.17 
धनुष्यनवरश्चासीत् तस्य शिष्यो महात्मन:।
दृष्टपूर्वो मया वीर चरन्त्या पाण्डवान् प्रति॥ १७॥
 
 
अनुवाद
वीर! यह उसी महात्मा का शिष्य है और धनुर्विद्या में उससे किसी प्रकार कम नहीं है। मैंने इसे पहले भी देखा है, जब यह पाण्डवों के साथ रहता था॥ 17॥
 
Valiant! He is the disciple of the same great soul and is no less than him in archery. I have seen him earlier when he was staying with the Pandavas.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)