श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 35: कौरवोंद्वारा उत्तर दिशाकी ओरसे आकर विराटकी गौओंका अपहरण और गोपाध्यक्षका उत्तरकुमारको युद्धके लिये उत्साह दिलाना  »  श्लोक 20-21
 
 
श्लोक  4.35.20-21 
त्वं हि राष्ट्रस्य परमा गतिर्मत्स्यपते: सुत:।
यथा हि पाण्डुपुत्राणामर्जुनो जयतां वर:॥ २०॥
एवमेव गतिर्नूनं भवान् विषयवासिनाम्।
गतिमन्तो वयं त्वद्य सर्वे विषयवासिन:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
मत्स्यराज के सुयोग्य पुत्र होने के कारण आप इस राष्ट्र के महान आश्रय हैं। जैसे विजयी योद्धाओं में श्रेष्ठ अर्जुन पाण्डवों के सर्वश्रेष्ठ आश्रय हैं, उसी प्रकार आप इस राज्य के निवासियों के लिए निश्चय ही परम मोक्ष हैं। हम सब मत्स्य देशवासी आपको पाकर ही आज धन्य हो रहे हैं।॥ 20-21॥
 
‘Being the worthy son of Matsyaraj, you are the great refuge of this nation. Just as Arjuna, the best among the victorious warriors, is the best refuge of the Pandavas, in the same way you are certainly the ultimate salvation for the residents of this kingdom. All of us, the residents of Matsya country, are blessed today only after getting you.'॥ 20-21॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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