श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 35: कौरवोंद्वारा उत्तर दिशाकी ओरसे आकर विराटकी गौओंका अपहरण और गोपाध्यक्षका उत्तरकुमारको युद्धके लिये उत्साह दिलाना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  4.35.13 
इष्वस्त्रे निपुणो योध: सदा वीरश्च मे सुत:।
तस्य तत् सत्यमेवास्तु मनुष्येन्द्रस्य भाषितम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
मेरा वह प्रिय पुत्र बाण चलाने और अन्यान्य अस्त्र-शस्त्र चलाने में निपुण है, युद्ध के लिए सदैव तत्पर रहता है और वीर है।’ उन महाराज का यह कथन आज अवश्य ही सत्य होना चाहिए॥13॥
 
That beloved son of mine is adept in the art of shooting arrows and using other weapons, is always ready for war and is a brave man.' This statement of that Maharaja must come true today.॥ 13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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