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श्लोक 4.35.13  |
इष्वस्त्रे निपुणो योध: सदा वीरश्च मे सुत:।
तस्य तत् सत्यमेवास्तु मनुष्येन्द्रस्य भाषितम्॥ १३॥ |
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| अनुवाद |
| मेरा वह प्रिय पुत्र बाण चलाने और अन्यान्य अस्त्र-शस्त्र चलाने में निपुण है, युद्ध के लिए सदैव तत्पर रहता है और वीर है।’ उन महाराज का यह कथन आज अवश्य ही सत्य होना चाहिए॥13॥ |
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| That beloved son of mine is adept in the art of shooting arrows and using other weapons, is always ready for war and is a brave man.' This statement of that Maharaja must come true today.॥ 13॥ |
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