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mahabharat 4.34.14-15h: यह सुनकर राजा युधिष्ठिर ने मत्स्यराज से पुनः कहा - 'हे राजन! आप बहुत सुन्दर बात कह रहे हैं। इस कथन के लिए मैं आपको बधाई देता हूँ। आप सदैव दयालु और अत्यंत प्रसन्न रहें।'   |   mahabharat अध्याय 4.34: राजा विराटद्वारा पाण्डवोंका सम्मान, युधिष्ठिरद्वारा राजाका अभिनन्दन तथा विराटनगरमें राजाकी विजयघोषणा   ।   mahabharat पर्व 4: विराट पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  4.34.14-15h 
ततो युधिष्ठिरो मत्स्यं पुनरेवाभ्यभाषत।
प्रतिनन्दामि ते वाक्यं मनोज्ञं मत्स्य भाषसे॥ १४॥
आनृशंस्यपरो नित्यं सुसुखी सततं भव।
 
 
अनुवाद
यह सुनकर राजा युधिष्ठिर ने मत्स्यराज से पुनः कहा - 'हे राजन! आप बहुत सुन्दर बात कह रहे हैं। इस कथन के लिए मैं आपको बधाई देता हूँ। आप सदैव दयालु और अत्यंत प्रसन्न रहें।'
 
Hearing this, King Yudhishthira again said to the King of Matsyas - 'O King! You are saying a very beautiful thing. I congratulate you on this statement. May you always remain kind and be extremely happy. 14 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)