श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 34: राजा विराटद्वारा पाण्डवोंका सम्मान, युधिष्ठिरद्वारा राजाका अभिनन्दन तथा विराटनगरमें राजाकी विजयघोषणा  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  4.34.11 
मनसश्चाप्यभिप्रेतं यथेष्टं भुवि दुर्लभम्।
तत् तेऽहं सम्प्रदास्यामि सर्वमर्हति नो भवान्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
इस पृथ्वी पर जो भी अन्य बहुमूल्य और इच्छित वस्तु दुर्लभ है, वह भी मैं तुम्हें देता हूँ। तुम हमारी सब वस्तुएँ पाने के अधिकारी हो॥11॥
 
Whatever other precious and desired thing is rare on this earth, I will give that also to you. You are entitled to get everything of ours.॥ 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)