श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 33:  »  श्लोक 45-46
 
 
श्लोक  4.33.45-46 
इत्युक्त: स तु पार्थेन सुशर्मा रथयूथप:।
तिष्ठ तिष्ठेति भीमं स सहसाऽभ्यद्रवद् बली॥ ४५॥
भीमस्तु भीमसंकाशो रथात् प्रस्कन्द्य पाण्डव:।
प्राद्रवत् तूर्णमव्यग्रो जीवितेप्सु: सुशर्मण:॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
भीमसेन की यह बात सुनकर रथियों का नायक बलवान सुशर्मा अचानक भीमसेन पर टूट पड़ा और चिल्लाने लगा, "खड़े हो जाओ, खड़े हो जाओ।" किन्तु पाण्डवपुत्र भीम तो स्वयं भीम के समान ही थे; वे तनिक भी विचलित नहीं हुए, वरन् रथ से कूदकर सुशर्मा के प्राण लेने के लिए बड़े वेग से उनकी ओर दौड़े।
 
On hearing Bhimasena say this, the strong Susarma, the leader of the charioteers, suddenly attacked Bhimasena, shouting, 'Stand, stand'. But Bhima, the son of Pandava, was like Bhima himself; he did not get agitated at all; rather, jumping from the chariot, ran towards Susarma with great speed to take his life.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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