श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 31: चारों पाण्डवोंसहित राजा विराटकी सेनाका युद्धके लिये प्रस्थान  »  श्लोक 15-16h
 
 
श्लोक  4.31.15-16h 
सुवर्णपृष्ठं सूर्याभं सूर्यदत्तोऽभ्यहारयत्।
दृढमायसगर्भं च श्वेतं वर्म शताक्षिमत्॥ १५॥
विराटस्य सुतो ज्येष्ठो वीर: शङ्खोऽभ्यहारयत्।
 
 
अनुवाद
सेनापति सूर्यदत्त (शतानीक) ने पीठ पर स्वर्णजटित तथा सूर्य के समान चमकने वाला कवच पहना था।विराट के ज्येष्ठ पुत्र वीरवर शंख ने श्वेत रंग का सुदृढ़ कवच पहना था, जिसके भीतरी भाग में लोहा लगा था तथा ऊपर नेत्रों के समान सौ चिह्न थे।
 
Commander Suryadatta (Shatanik)- wore an armour studded with gold on the back and shining like the sun. Virat's eldest son Veervar Shankh wore a strong armour of white colour, the inside of which was fitted with iron and on the top were hundred marks like eyes.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)