श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 31: चारों पाण्डवोंसहित राजा विराटकी सेनाका युद्धके लिये प्रस्थान  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  4.31.1-2 
वैशम्पायन उवाच
ततस्तेषां महाराज तत्रैवामिततेजसाम्।
छद्मलिङ्गप्रविष्टानां पाण्डवानां महात्मनाम्॥ १॥
व्यतीत: समय: सम्यग् वसतां वै पुरोत्तमे।
कुर्वतां तस्य कर्माणि विराटस्य महीपते:॥ २॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- महाराज! उन दिनों उस महान नगर में वेश बदलकर छिपकर राजा विराट का कर्तव्य निभाते हुए अतुलनीय तेजस्वी महात्मा पाण्डवों का तेरहवाँ वर्ष अच्छी तरह व्यतीत हो रहा था।
 
Vaishampayanji says- Maharaj! In those days, the thirteenth year of the incomparably brilliant Mahatma Pandavas had passed well, hiding in disguise in that great city and performing the duties of King Virat. 1-2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)