श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 30: सुशर्माके प्रस्तावके अनुसार त्रिगर्तों और कौरवोंका मत्स्यदेशपर धावा  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  4.30.2-3 
असकृन्निकृता: पूर्वं मत्स्यशाल्वेयकै: प्रभो।
सूतेनैव च मत्स्यस्य कीचकेन पुन: पुन:॥ २॥
बाधितो बन्धुभि: सार्धं बलाद् बलवता विभो।
स कर्णमभ्युदीक्ष्याथ दुर्योधनमभाषत॥ ३॥
 
 
अनुवाद
कर्ण की ओर देखकर उसने दुर्योधन से कहा - 'हे प्रभु! इससे पहले भी मत्स्य और शाल्व देश के सैनिकों ने हम पर अनेक बार आक्रमण करके हमें कष्ट पहुँचाया है। मत्स्यराज का सेनापति महारथी सूतपुत्र कीचक अपने भाइयों के साथ मुझ पर बार-बार आक्रमण करके मुझे बलपूर्वक कष्ट पहुँचा रहा है।॥ 2-3॥
 
Looking at Karna, he said to Duryodhan - 'O Lord! Earlier, the soldiers of Matsya and Shalva countries have attacked us many times and troubled us. The great warrior Sutaputra Kichaka, the commander of Matsya king, has repeatedly attacked me with his brothers and harassed me with force.॥ 2-3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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