श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 3: नकुल, सहदेव तथा द्रौपदीद्वारा अपने-अपने भावी कर्तव्योंका दिग्दर्शन  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  4.3.13 
सोऽहमेवं चरिष्यामि प्रीतिरत्र हि मे सदा।
न च मां वेत्स्यते कश्चित् तोषयिष्ये च पार्थिवम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
इस तरह मैं गायों की सेवा करूँगी। मुझे यह काम हमेशा से पसंद रहा है। वहाँ मुझे कोई पहचान नहीं पाएगा। मैं अपने काम से राजा विराट को संतुष्ट करूँगी।
 
In this way I will serve the cows. I have always loved this work. No one will be able to recognize me there. I will satisfy King Virata with my work.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)