'अथवा वे किसी विपत्ति में पड़कर सदा के लिए नष्ट हो गए हों। अतः हे कुरुपुत्र! हे मनुष्यों के स्वामी! आप अपने मन को शान्त करके, जो उचित समझें, उसे पूरे उत्साह के साथ करें।'॥18॥
‘Or they may have fallen into some adverse situation and may have been destroyed forever. Therefore, O son of Kuru! O lord of human beings! You should calm your mind and do whatever you think is right with full enthusiasm.'॥ 18॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि कर्णदु:शासनवाक्ये षड्विंशोऽध्याय:॥ २६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें कर्ण और दु:शासनके वचनविषयक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २६॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)