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श्लोक 4.25.22  |
प्रियमेतदुपश्रुत्य शत्रूणां च पराभवम्।
कृतकृत्यश्च कौरव्य विधत्स्व यदनन्तरम्॥ २२॥ |
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| अनुवाद |
| हे कुरुपुत्र! शत्रुओं की पराजय का यह मधुर समाचार सुनकर तुम्हें प्रसन्न होना चाहिए और इसके बाद जो आवश्यक हो वह करना चाहिए ॥ 22॥ |
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| O son of Kuru! After hearing this sweet news of the defeat of your enemies, you should feel gratified and after this do whatever is required. ॥ 22॥ |
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इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि चारप्रत्यागमने पञ्चविंशोऽध्याय:॥ २५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें गुप्तचरोंके लौटकर आनेसे सम्बन्ध
रखनेवाला पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २५॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ६ श्लोक मिलाकर कुल २८ श्लोक हैं।) |
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