वैशम्पायनजी कहते हैं- हे राजन! सैरन्ध्री की यह बात सुनकर केकय की राजकुमारी सुदेष्णा ने अपने भाई के शोक से पीड़ित होकर दुःख से आकुल होकर द्रौपदी से दुःखी स्वर में कहा- 'भद्र! जब तक आपकी इच्छा हो, तब तक आप यहीं रहें; किन्तु विशेष रूप से मेरे पति और पुत्रों की रक्षा करें। इसी हेतु मैं आपकी शरण में आई हूँ।'
Vaishampayana says- O King! Hearing this from Sairandhri, the princess of Kekaya, Sudeshna, suffering from the grief of her brother and overwhelmed with sorrow, said to Draupadi in a sad tone- 'Bhadra! Stay here as long as you wish; but especially protect my husband and sons. For this, I have come to your refuge.'
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि कीचकवधपर्वणि कीचकदाहे चतुर्विंशोऽध्याय:॥ २४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत कीचकवधपर्वमें कीचकोंके दाह-संस्कारविषयक
चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २४॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल ३४ श्लोक हैं।)
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)