श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 22: कीचक और भीमसेनका युद्ध तथा कीचकवध  »  श्लोक d1
 
 
श्लोक  4.22.d1 
(कीचक उवाच
तथा भद्रे करिष्यामि यथा त्वं भीरु मन्यसे।
एक: सन् नर्तनागारमागमिष्यामि शोभने॥
समागमार्थं सुश्रोणि शपे च सुकृतेन मे।
 
 
अनुवाद
कीचक बोला- भद्रे! कायर! मैं जैसा उचित समझूँगा वैसा ही करूँगा। शोभने! मैं तुमसे मिलने के लिए अकेले ही नृत्यशाला में आऊँगा। सुश्रुणि! मैं अपने सतीत्व की शपथ लेकर यह कह रहा हूँ।
 
Keechak said— Bhadre! Coward! I will do as you think is right. Shobhane! I will come alone to the dance hall to meet you. Sushruni! I am saying this by swearing on my virtue.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)