श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 22: कीचक और भीमसेनका युद्ध तथा कीचकवध  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  4.22.46 
अकस्मान्मां प्रशंसन्ति सदा गृहगता: स्त्रिय:।
सुवासा दर्शनीयश्च नान्योऽस्ति त्वादृश: पुमान्॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
मेरे घर की स्त्रियाँ सहसा मेरी प्रशंसा करने लगती हैं और कहती हैं, ‘आपके समान सुन्दर वेशधारी और आकर्षक कोई दूसरा पुरुष नहीं है।’ ॥46॥
 
The women of my house suddenly begin praising me and say, 'There is no other man as beautifully dressed and attractive as you.' ॥ 46॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)