श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 22: कीचक और भीमसेनका युद्ध तथा कीचकवध  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  4.22.33 
तं गह्वरे प्रकाशे वा पोथयिष्यामि कीचकम्।
अथ चेदपि योत्स्यन्ति हंसे मत्स्यानपि ध्रुवम्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
मैं कीचक को जहाँ कहीं भी पाऊँगा, चाहे एकान्त में हो या भीड़ में, उसे कुचल दूँगा और यदि मत्स्य देश के लोग उसकी ओर से युद्ध करेंगे, तो मैं उन्हें भी अवश्य मार डालूँगा ॥33॥
 
I shall crush Keechak wherever I find him, whether in solitude or in a crowd. And if the people of Matsya country fight on his side, I shall certainly kill them too. ॥ 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)